May 2, 2017

मँगरू क तिलकहरू

मँगरू क तिलकहरू

________

अभी कुछ ही दिन हुआ तिलेसर तिवारी के मझिला बेटा 'तेगा तिवारी' उर्फ़ 'मंगरु' को प्राइमरी में मास्टर हुए। जिस दिन joining लेटर आया उसी दिन तिवाराईन मईया नें पांच रूपिया का 'धार' डीह बाबा को चढ़ा दिया। पूरा सेर भर दूध का खप्पर काली माई के चउरा पर भी चढ़ा दिया गया।

मँगरू के समय में मोलायम चाचा की सरकार थी। इसलिए मँगरू हाई स्कूल अउर इण्टर, दूनो में पचासी परसेंट लाँघ गए। तीन -पांच करके ग्रेजुएशन में भी ठीक -ठाक नम्बर आ गया। एक दिन तिवारी बाबा के एक शुभचिंतक जजमान नें सुझाव दिया कि, ' ए महाराज मँगरू का मेरिट बढ़िया है, काहे नाही बीटीसी करने को कहते हैं। दक्खिन टोला के रामदुलारे सिंह का कॉलेज है, बढ़िया मेरिट उठेगा। आ खोरहट के देई माई चाह दीं, तो मँगरू को मास्टर बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।

ख़ैर,
खोरहट की देई माई ने तिवारी बाबा की गुहार सुन भी ली और मँगरू मास्टर हो गए।

ई सब तो हम आपको केवल जानकारी के लिए बता रहे थे। असली कहानी तो अब शुरू होती है।

कुछ दिन से तिलेसर तिवारी के दुआर पर तिलकहरुओं की लाइन लगी है। का नोटबंदी के समय बैंक में लें लगता था। उहो फेल है।
तिवारी बाबा भी बहन कु0 कायावती की तरह एकदम रटा-रटाया वक्तव्य तैयार कर लिए थे। जो भी आता बस चालू हो जाते:-
देखिये, लड़के का बियाह तो हमको करना ही है। आज नहीं तो काल्ह करें। आजकल सरकारी नौकरी वाले लड़के मिल कहाँ रहे हैं। आप तो जानते ही हैं कि प्राइमरी का मास्टर होना कितनी बड़ी बात है। देवता भी ऐसी नौकरी के लिए स्वर्ग छोड़ने को तैयार हैं । क्या ठाठ की नौकरी है, जब मन करे तब इस्कूल जाइये, आ जब मन करे चल दीजिये। महीना पूरा होते चालीस हज़ार रूपया आपके खाता में। केवनो फ़ौज वालों की तरह जान हथेली पर लेके थोड़े ही चलना है। इसीलिए तो फौजियों का रेट गिर गया है। बगले के महेन्दर मिसिर का लड़का बीएसएफ में है। कोई बियाह करने को तैयार ही नहीं हो रहा था। ........ऊ तो हमरे साढू किसी तरह तिगड़म लगा के बियाह कराये। गरीब घर की लड़की थी।......

भाई साहब देखिये, ई सब कहने का मतलब यही था कि प्राइमरी का मास्टर मने 'राजा'। अब राजा की बियाह में राजा जईसा खरचा भी होगा। और उसमें भी डाल-वाल, गहना-गुरिया, जो भी आप देंगे ऊ तो अपनी बेटी को ही देंगे न। हमको बस दुआर का खर्चा जो है 'पंद्रह लाख रूपया' और एक ठो फोर व्हीलर दे दीजिए। बाकी हम आपसे कुछ माँग थोड़े ही रहे हैं। ई तो रेट हो गया है। बाकी आप भी समाज में घूम रहे हैं, जानते ही होंगे।"

इतना कहने के बाद ही तिवारी बाबा साँस लेते। अब आप तो जानते ही हैं ' मजबूरी का दूसरा नाम बेटी का बाप'।

ख़ैर,
मँगरू का बियाह तय हो गया। लड़की का नाम वैदेही तिवारी। इलाहबाद यूनिवर्सिटी से एम०ए० थी और सिविल सर्विस एस्पिरेन्ट थी। देखउटी का दिन रखाया। शीतला माता मंदिर में आना तय हुआ। उक्त तिथि पर दोनों पक्ष शीतला मन्दिर में उपस्थित हुए। इधर तिलेसर तिवारी सोच रहे हैं कि....माड़ो हिलाई में का माँगा जाये।
बातचीत चल ही रही थी कि वैदेही नें मँगरू से बात करने की इच्छा ज़ाहिर की .........

अब दोनों तालाब के किनारे टहल रहे थे. वैदेही ने पूछा, "व्हाई हैव यू चोज़ेन टीचिंग एज योर करियर ऑप्शन?
मँगरू बस इतने समझ पाए की कुछ आँग्ल भाषा में कहा गया है। बाकी कुछ पल्ले नहीं पड़ा.....
तब तक दूसरा सवाल जैसे तोप से गोला दागा जाता है, वैसे ही मँगरू पर दाग दिया गया। "व्हाई आर यू नॉट सेयिंग एनीथिंग? यू मस्ट वाना रिमूव द डार्कनेस ऑफ़ इल्लिटरेसी फ्रॉम आवर कंट्री.......

मँगरू का मुँह एकदम धुँआ.....
कुछ समझ में आये तब न बोले...
मँगरू का अंग्रेजी से एकदम भवह- भसुर वाला रिश्ता था।

वैदेही को बात समझने में तनिक भी देरी न लगी
वो तुरन्त अपने पिता जी के पास आई और बोली, "पिताजी मुझे किसी ऐसे आदमी से शादी नहीं करनी जो ना जाने कितने गरीब माँ बाप के सपनों को उजाड़ रहा है। जो ख़ुद नक़ल और घूस के बल पर नौकरी पा गया हो......
वो क्या भला ज्ञान बाँटेगा....
आप जल्दी से सामान पैक करिये, अब मैं यहाँ एक मिनट भी नहीं रुकना चाहती।.........

इस वक़्त तिलेसर तिवारी का मुँह देखने लायक था।.....
ऐसा लग रहा था चुनाव हारने के बाद अक्लेश भईया प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे हों।......
उधर वैदेही के कहने की देरी थी.....
सामान पैक.....
सारा सामान गाड़ी में।.....
तिवारी जी का खेमा भी अपने लाव लश्कर के साथ लौट आया।........
अब तो तिवारी बाबा को दिनही में तरई लउक रहा था।....
मँगरू नाक कटा दिए। .....
अरियात- करियात में हल्ला हो गया....कि मँगरू मास्टर को लड़किये रिजेक्ट कर दी है। .....
तिवाराईंन का साँसत था....
जौने गोतीन आती उहे चार बात कह के निकल जाती....
" ढेला पर चढ़ के ऊँच बनल रहल ह लोग".....

माई बाप को तो फिर भी उम्मीद था...कि यहाँ नहीं तो कहीं और सही।
लेकिन मँगरू का तिलकहरू वाला खिस्सा तो जग जाहिर हो गया।

आप लोग भी तैयारी करते रहिए....
जैसे ही मँगरू का बियाह तय होगा.......
नेवता पहुँच जायेगा।

Dec 25, 2015

कवने खोंतवा में लुकाइलु

 कवने खोंतवा में लुकाइलु / भोलानाथ गहमरी

 कवने खोंतवा में लुकाइलु, आहि रे बालम चिरई,
वन-वन ढूँढलीं, दर-दर ढूँढलीं, ढूँढलीं नदी के तीरे,
साँझ के ढूँढलीं, रात के ढूँढलीं, ढूँढलीं होत फजीरे,
मन में ढूँढलीं, जन में ढूँढलीं, ढूँढलीं बीच बजारे,
हिया-हिया में पैंइठ के ढूँढलीं, ढूँढलीं विरह के मारे,
कौने सुगना पे लुभइलु, आहि रे बालम चिरंई……….

गीत के हम हर कड़ी से पूछलीं, पूछलीं राग मिलन से,
छन्द-छन्द, लय ताल से पूछलीं, पूछलीं सुर के मन से,
किरण-किरण से जाके पूछलीं, पूछलीं नील गगन से,
धरती और पाताल से पूछलीं, पूछलीं मस्त पवन से,
कौने अंतरे में समइलु, आहि रे बालम चिरई…………

मन्दिर से मस्जिद तक देखलीं, गिरजा से गुरद्वारा,
गीता और कुरान में देखलीं तीरथ सारा,
पण्डित से मुल्ला तक देखलीं, देखलीं घरे कसाई,
सागरी उमरिया छछनत जियरा, कबले तोहके पाई,
कौनी बतिया पर कोहइलु, आहि रे बालम चिंरई……


ग्राम्य चित्रण

ग्राम्य चित्रण / भोलानाथ गहमरी

काँट –कुश से भरल डगरिया, धरीं बचा के पाँव रे
माटी ऊपर, छानी छप्पर, उहे हामरो गाँव रे…..

चारों ओर सुहावन लागे, निर्मल ताल-तलैया,
अमवा के डाली पर बैठल, गावे गीत कोइलिया,
थकल-बटोही पल-भर बैठे, आ बगिया के छाँव रे…

सनन –सनन सन बहे बायरिया, चरर-मरर बंसवरिया,
घरर-घरर-घर मथनी बोले, दहिया के कंह्तरिया,
साँझ सवेरे गइया बोले, बछरू बोले माँव रे…….

चान-सुरुज जिनकर रखवारा, माटी जिनकर थाती,
लहरे खेतन, बीच फसलीया, देख के लहरे छाती,
घर-घर सबकर भूख मिटावे, नाहीं चाहे नाव रे…….

निकसे पनिया के पनिघटवा, घूँघट काढ़ गुजरिया,
मथवा पर धई चले डगरिया, दूई-दूई भरल गगरिया,
सुधिया आवे जो नन्द गाँव के रोवे केतने साँवरे……

तन कोइला मन हीरा चमके, चमके कलश पिरितिया,
सरल स्वाभाव सनेही जिनकर, अमृत बासलि बतिया,
नेह भरल निस कपट गगरिया, छलके ठांवे-ठांव रे…


Dec 18, 2015

भोजपुरी के शेक्सपियर

 भोजपुरी के शेक्सपियर

मेहनत रेत पर लिखी इबारत नही होती; जिसे हवा का एक झोंका या पानी का एक बुलबुला मिटा दे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भिखारी ठाकुर ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्हें भोजपुरी साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है। 

भिखारी ठाकुर को साहित्य की सभी विधाओं- संगीत, नाटक, गीत, काव्य, रंगमंच व नृत्य पर समान अधिकार था। शुरुआती जीवन में रामायण मंडली के साथ काम करने के कारण उनके काव्य चौपाइयों में हैं।  इस महान विभूति का जन्म सारण में 18 दिसंबर, 1887 को साधारण परिवार में हुआ था। इसलिए उनका प्रारंभिक जीवन घोर गरीबी में बीता। भिखारी ठाकुर का संपूर्ण साहित्य सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित है। 

चाहे आप्रवसान की समस्या हो या आर्थिक तंगी या फिर पारिवारिक कलह- सब पर उन्होंने तंज कसे। जिस महिला अधिकारिता और महिला सशक्तिकरण की बात आज की जा रही है, उसे भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में काफी पहले ही उठाया था। बेटी वियोग, भाई विरोध, विदेसिया, गबरघिचोर, ननद-भौजाई, गंगा स्नान व राधेश्याम विहार  में स्त्री-प्रश्न को प्रमुखता से उठाया गया है। 

विधवा विलाप  में विधवाओं के प्रति सामाजिक नजरिये को दर्शाया गया है, जबकि गबरघिचोर  में नाजायज बच्चे का प्रश्न है। बेटी बेचवा  में अधेड़ दूल्हे से शादी की बात है, तो विदेसिया  में प्रवासी बिहारी की कथा। दुर्भाग्य है कि आज भी हजारों की संख्या में बिहारी मजदूर पलायन को बाध्य हैं, और हजारों महिलाएं अपने पति का परदेश से लौटने की राह तकती रहती हैं।
साभार हिदुस्तान


Sep 18, 2015

सदा भवानी दाहिने सन्मुख रहे गणेश

सदा भवानी दाहिने सन्मुख रहे गणेश ।
पाँच देव मिली रक्षा करे ब्रम्हा विष्णु महेश ।।